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Wednesday, 29 July 2026
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- न्यायपालिका

जमानतों पर अदालत की बेतुकी शर्तें : सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस उज्जल भुयन

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुयन ने भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में आयोजित ‘5वें जस्टिस जी.पी. सिंह मेमोरियल लेक्चर’ के दौरान भारत के लोकतांत्रिक माहौल पर बात की। उन्होंने खुलकर कहा कि देश में अपनी राय रखने और सवाल पूछने की जगहें तेजी से कम हो रही हैं। जस्टिस भुयन ने […]

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुयन ने भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में आयोजित ‘5वें जस्टिस जी.पी. सिंह मेमोरियल लेक्चर’ के दौरान भारत के लोकतांत्रिक माहौल पर बात की। उन्होंने खुलकर कहा कि देश में अपनी राय रखने और सवाल पूछने की जगहें तेजी से कम हो रही हैं।

जस्टिस भुयन ने अपने संबोधन में देश की न्याय व्यवस्था, अभिव्यक्ति की आजादी और पुलिस-प्रशासन के रवैये पर कई जरूरी सवाल खड़े किए

वाराणसी की एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा:

“कुछ युवा गंगा नदी में नाव पर बैठकर इफ्तार पार्टी कर रहे थे और चिकन बिरयानी खा रहे थे। इसके लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 3 महीने तक जेल में रहना पड़ा। मैं खुद से पूछता हूं—क्या गंगा नदी पर चिकन बिरयानी खाना कोई कानूनन अपराध है? ऐसा कोई कानून नहीं है। फिर ऐसे काम के लिए लोगों को गिरफ्तार करके 3 महीने तक जमानत क्यों नहीं मिली? आम नागरिक और देश की जनता यह सब देख रही है।”

जस्टिस भुयन ने इस बात पर दुख जताया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को अपराधी की तरह देखा जा रहा है

“जो लोग पर्यावरण को हो रहे नुकसान जैसी गंभीर सच्चाई पर आवाज उठाते हैं, उन्हें अपराधियों की तरह खदेड़ा जा रहा है। यूनिवर्सिटी कैंपसों में अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें 30-40 दिनों तक जमानत नहीं मिलती।

जस्टिस भुयन ने यह भी सवाल उठाया कि अदालतें जमानत देते वक्त ऐसी शर्तें क्यों लगा रही हैं, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों को ही खत्म कर देती हैं 

“एक मामले में किसी नेता के बयान पर फेसबुक टिप्पणी करने पर FIR हुई। जब जमानत मिली तो शर्त रखी गई कि अपना पासपोर्ट जमा करें और फेसबुक पर कुछ न लिखें! ऐसे ही कई छात्र कार्यकर्ताओं को जमानत देते वक्त अदालतें कहती हैं कि वे किसी सार्वजनिक सभा या रैली में हिस्सा नहीं लेंगे। ऐसी शर्तें लगाकर क्या अदालतें यह संदेश दे रही हैं कि लोग सार्वजनिक जीवन में बोलना ही बंद कर दें?

संविधान के ‘सेपरेशन ऑफ पावर्स’ (शक्तियों के बंटवारे) पर बोलते हुए उन्होंने कहा

“अगर तीन पैरों वाले स्टूल के दो पैर एक ही जगह आ जाएं, तो स्टूल गिर जाएगा। कार्यपालिका और न्यायपालिका का अलग रहना जरूरी है। जब देश के पूर्व चीफ जस्टिस यह कहकर राज्यसभा जाते हैं कि वे न्यायपालिका और सरकार के बीच की दूरी कम करने जा रहे हैं, तो यह बुनियादी तौर पर पूरी तरह गलत है।”

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